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मैं लहू बेचने निकला हूँ,लोगे ? क्या दोगे बोलो ?

मत आँख मूंदकर सौदा करना,पहले इसको परखो,तोलो |

इसके गुण दोषों को आओ,पहले जरा बता दूँ मैं,

कितनी इसमें खोट भरी है, है कितना खरा बता दूँ मैं |

शर्म के मारे रंग लाल है, खुदगर्जी से मालामाल है,

पल पल बदले अपनी चाल है, अवगुणों की दृढ ढाल है,

झूँठे बजाता अपने गाल है, फरेबों से खस्ताहाल है,

गलती पर ना कोई मलाल है, ये कुत्ते की दुम का बाल है,

सच्चे मन से कहना, तुम क्या इसके जैसे होगे,बोलो ?

मैं लहू बेचने निकला हूँ,लोगे ? क्या दोगे बोलो ?                                   

सितम सहे ना मुँह खोला, चीर खिचें कुछ भी ना बोला,

पर धन देख सदा ये डोला, ऊपर ठोस अन्दर से पोला,

शातिर है पर बनता भोला, है शैतानी का इसका चोला,

ज़हर दिलों में अनगिन घोला, पर घर फूंके ये वो शोला,

सच्चे मन से कहना, तुम क्या इसके जैसे होगे,बोलो ?

मैं लहू बेचने निकला हूँ,लोगे ? क्या दोगे बोलो ?                                    

निष्ठुर,निर्दयी,घमंडी है ये, फिरकापरस्त,पाखंडी है ये,

दंगाई और उद्दंडी है ये, हवाला की मंडी है ये,

शौर्य विहीन शिखण्डी है ये, पतन, पाप की पगडण्डी है ये,

बिना साख की हुण्डी है ये, फ़सल विनाशक शुंडी है ये,

सच्चे मन से कहना, तुम क्या इसके जैसे होगे,बोलो ?

मैं लहू बेचने निकला हूँ,लोगे क्या दोगे बोलो ?                                   

क्या कहा नहीं खरीदोगे ? ना बिल्कुल भी कुछ इसका दोगे,

तुमको पसंद ना आया सौदा, इस कारण ही नहीं खरीदा,

लेकिन जाने से पहले सबसे, है मेरा एक सवाल,

सच्चे मन से उत्तर देना,मत देना तुम इसको टाल

क्या तुम में इसके जैसी, एक नहीं है खोट,

क्या तुमने कभी किसी को, नहीं पंहुचाई चोट,

सच्चे मन से कहना, तुम क्या इसके जैसे होगे,बोलो ?

मैं लहू बेचने निकला हूँ,लोगे क्या दोगे बोलो ?   

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

                                

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