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मैं एकाकी अपने पथ पर,बिना मुड़े चुप-चाप चला ,

विपदाओं से क्या घबराना? मैं तो उनके बीच पला |

शूल मेरे पावों के सहचर, संगी की मुझको चाह नहीं,

पर्वत,सागर,हिम,अनल की तनिक मुझे परवाह नहीं,

मैं तो गुज़रूँ उन ठौरों से, है कोई जहाँ पर राह नहीं,

बढ़ता देख मुसीबत ज्यादा,होता कम उत्साह नहीं ,

मैं कर्म पंथ का अनुगामी, ना देखूँ अपना बुरा भला |

मैं एकाकी अपने पथ पर,बिना मुड़े चुप-चाप चला ||

तमस निशा की नीरवता में, चरण गति ना रुक पाती,

अग्रगामी मेरी आशाएं, पथ को आलोकित कर जाती,

अभिप्राय जगत में आने का, कुछ यूं कह मुझको समझाती,

कायर कर पर कर धर बैठें , साहसी हैं कर्मों के साथी,

ठोकर पर ठोकर खाकर भी, लक्ष्य अपने से नहीं टला |

मैं एकाकी अपने पथ पर,बिना मुड़े चुप-चाप चला ||

भूचाल,प्रभंजन,तूफ़ान,तड़ित,उर भय भरने वाले है,

ऐसा भी तो हम सोचें, ये नव सृजन करने वाले हैं,

गति का ही तो नाम जगत है, सब बनने मिटने वाले हैं,

जड़ हो इक ठौर जमें क्यों ? जब हम चलने वाले हैं,

ये ही क्रम निरंतर चलता, डूबा दिनकर, फ़िर निकला |

मैं एकाकी अपने पथ पर,बिना मुड़े चुप-चाप चला ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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