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उर में सोये भाव जगाने,मैंने कलम उठाई है,

अन्धकार में आग लगाने, मैंने कलम उठाई है |

अल्पसंख्यक है आज अगर,तो केवल वो नरता है,

पिछड़े,अति पिछड़े हैं तो, दया,स्नेह और ममता हैं |

निज,पर का भेद मिटाने, मैंने कलम उठाई है |

उर में सोये भाव जगाने,मैंने कलम उठाई है ||

पीर,फकीरों की चौखट को, हिन्दू हैं क्या नहीं चूमते ?

दिल पर रखकर हाथ कहो, क्या मुस्लिम पत्थर नहीं पूजते ?

धर्मान्धों को राह दिखाने,मैंने कलम उठाई है |

उर में सोये भाव जगाने,मैंने कलम उठाई है ||

निज माता की देह समूची, हम आदर से पूजें, देखें,

जीव जननी वसुधा का गौरव, क्योंकर है टुकड़ों के लेखे ?

मिट्टी की खुशबू फ़ैलाने,मैंने कलम उठाई है |

उर में सोये भाव जगाने,मैंने कलम उठाई है ||

भाषा, रंग-रूप भले अलग, क्या तन अंग अलग होते ?

सुख-दुःख,हँसने-रोने के, क्या हैं ढंग अलग होते ?

मानवता का पथ बतलाने,मैंने कलम उठाई है |

उर में सोये भाव जगाने,मैंने कलम उठाई है ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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