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BP1 

अपने जब आहत करते हैं, उर पीर अनल की सहता है

फिर भी उनको अपना समझ, ना प्रत्युतर कुछ कहता है ||

ये कैसे अपने ?समझ ना पाऊं सच है,या एक छलावा |

अधरों पर ख़ामोशी रहती, अन्दर अन्दर पछतावा ||

निर्जल नयन नज़र हैं आते, अंतस में लावा बहता है |

अपने जब आहत करते हैं, उर पीर अनल की सहता है |

कुछ रिश्ते संग जन्म के होते , कुछ पीछे हैं बनते जाते |

कैसी विवशता नर जीवन की ? ना चाहकर भी उन्हें निभाते |

अधर हास,मृदुल वाणी,पर कपट ह्रदय में रहता है |

अपने जब आहत करते हैं, उर पीर अनल की सहता है |

प्यार नहीं, समभाव नहीं, अपना कहने की विवशता है |

रिश्तों का भार उठाने की,यह कैसी परवशता है ?

निज सम नहीं हैं जो जन , क्यों जग अपना कहता है ?

अपने जब आहत करते हैं, उर पीर अनल की सहता है |

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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