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dejected jesus

प्रारब्ध प्रबल, पुरुषार्थ व्यर्थ,कैसे कोई जी पाये ?

तिमिराच्छादित मन आँगनमें,कोई तो आशा दीप जलाये||

जगती का जंजाल महा,उलझा उलझन के धागों से,

स्वार्थ का अभिषेक यहाँ,सहृदय कौन अभागों से ?

हैं नीलकंठ कितने अवनी पर ?तज अमृत, विष पी जाये |

तिमिराच्छादित मन आँगन में,कोई तो आशा दीप जलाये||

करता कोई,भरता कोई,किस्मत पर कोई जोर नहीं,

शर संधान करे जन कैसे?जीवन धनुष में डोर नहीं,

अर्जुन का आदर,कर्ण उपेक्षित,भेद ये कैसा बतलाये?

तिमिराच्छादित मन आँगन में,कोई तो आशा दीप जलाये||

जिसका बाना बना रक्षा का,वो ही क्यूँ है छल करता ?

सीता कैसे रहे सुरक्षित ?हर सूरत में रावण बसता,

चेहरे के पीछे अनगिन चेहरे,हर पल नज़रें धोखा खाये|

तिमिराच्छादित मन आँगन में,कोई तो आशा दीप जलाये||

विपदा में अपने गैर बने,यह कैसा है चलन यहाँ ?

गंगा में गंदे नालों का,होता देखो मिलन  यहाँ,

जो खुद अपनी मुक्ति को तरसे,उससे कैसे कोई मुक्ति पाये ?

तिमिराच्छादित मन आँगन में,कोई तो आशा दीप जलाये||

जीवन दृष्टि इस सृष्टि में,पल पल रूप बदलती है,

पालन करने वाली वसुधा भी,अंतस से आग उगलती है,

कब बदलेगा भाव किसी का,ज्ञात नहीं होने पाये|

तिमिराच्छादित मन आँगन में,कोई तो आशा दीप जलाये||

गहरा के उठी घटा गगन में,देख धरा मुस्काती है,

सोये,अलसाये उर आँगन के,सपनों को पंख लगाती है,

जिसका कृत्य बरसना है,वो बदरी क्यूँ बिन बरसे जाये?

तिमिराच्छादित मन आँगन में,कोई तो आशा दीप जलाये||

शारदा केवल शालाओं में,हर घर लक्ष्मी पुजती है,

स्वार्थ शिखा अति प्रचंड,लौ अपनेपन की बुझती है,

कैसे सफल मनोरथ हों जब,अंगारों से आग बुझाये||

तिमिराच्छादित मन आँगन में,कोई तो आशा दीप जलाये||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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