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Right-to-Education

आज़ाद भारत में वर्तमान में अगर सबसे ज्यादा  प्रयोग किसी क्षेत्र में हो रहें हैं तो वह है- शिक्षा क्षेत्र |लेकिन अगर उद्देश्य पर गहराई से चिंतन करें तो पायेंगें कि प्रयास सकारात्मक नहीं हैं ,यह इसे अतल में ले जाने वाले हैं |कारण की तह में जाने की जरूरत नहीं हैं ,क्योंकि पश्चिम का अन्धानुकरण स्पष्ट परिलक्षित है |

हर देश की अपनी संस्कृति ,सामाजिक संरचना ,आवश्यकता और भौगोलिक विशेषता होती है | उस पर हम किसी अन्य व्यवस्था को थोपने का प्रयास करेंगे तो परिणाम विपरीत ही प्राप्त होंगे ,क्योंकि जहाँ अनुकूलता नहीं होती वहाँ प्रतिकूलता विद्यमान रहती है |

शिक्षा के क्षेत्र में यही तो हमारी सरकारें कर रही हैं |वे अपनी गौरवमयी प्राचीन शिक्षा प्रणाली को हेय मानकर पश्चिम की प्रणालियों का अन्धानुकरण कर रही हैं ,जिसके परिणामस्वरूप शिक्षा का ह्रास दिन प्रतिदिन हो रहा है |वर्त्तमान में लर्निंग (सीखना)पद्दति पर पूरा जोर दिया जा रहा है |सारा ध्यान इस बात पर केन्द्रित है कि बालक सीखे |

अब हम लौटकर हमारी प्राचीन शिक्षण पद्दति को देखे तो पायेंगे कि वहाँ ध्यान केन्द्रित था कि बालक समझे |सीखना और समझना, उपरी स्तर पर इनमें कोई खास भेद दृष्टिगोचर नहीं होता है ,लेकिन इन शब्दों की गहराई में धरा गगन का अंतर है |

मसलन हम पालतू पशु जैसे घोडा ,ऊँट इत्यादि को सतत प्रयासों और बार बार के दोहरान से नाचना तो सिखा देते हैं,पशु ने नाचना तो सीख लिया लेकिन,नृत्य क्या है ?क्यों किया जाता है ?इसका महत्त्व क्या है ?वह इसके गुण दोषों की विवेचना नहीं कर सकता,अर्थात पशु ने नृत्य करना तो सीख लिया लेकिन उसके महत्त्व से वह अपरिचित रहता है |उसे इन बातों की समझ नहीं होती है,यही सीखने और समझने में मूलभूत अंतर है|

जब तक बालक में सीखने के साथ समझ उत्पन्न नहीं होगी उसका सर्वांगीण विकास नहीं होगा उसकी शिक्षा अधूरी रहेगी|यह हमारी शिक्षा व्यवस्था कि खामी है जिसका खामियाजा देश भुगत रहा है |

हमारी प्राचीन शिक्षा पद्दति गुरू केन्द्रित थी,वहाँ गुरू का दर्जा ईश्वर से ऊपर था|इस गुरुकुल पद्दति में अध्ययन कर संसार में अपना नाम अमर करने वालों और जगत का उपकार करने वालों के सिर्फ नामों भर से एक विशाल पुस्तक की रचना हो सकती है |इतिहास गवाह है कि उन्हीं लोगों ने भारत को विश्व गुरू का दर्जा दिलवाया था |वर्तमान शिक्षण व्यवस्था बाल केन्द्रित है,गुरू गौण है |सूर्य जो रोशनी और ऊर्जा का प्रदाता है,हम उसके महत्त्व को अनदेखा कर सिर्फ सौर उर्जा का महत्त्व प्रतिपादित करें  तो हमारा यह कृत्य सारहीन होगा या सराहनीय|निर्णय करने के लिए आप स्वतन्त्र हैं|

वर्तमान में जो राजकीय विद्यालय हैं उन्हें शिक्षा मंदिर से भोजनालय में तब्दील कर दिया गया है |जहाँ बालक को ज्ञानार्जन के लिए आना चाहिए था वहाँ वह खाना खाने को आता है |बालक को पोषाहार मिले इससे उत्तम कोई बात नहीं हो सकती ,लेकिन इसका दायित्व या तो सरकार को स्वयं या किसी सामाजिक संरचना को सौपना बेहतर निर्णय साबित होता जिससे ना तो शिक्षण व्यवस्था प्रभावित होती ना छात्रों का अहित होता |

कहने को कुछ भी कहें लेकिन वास्तव में वर्तमान शासन व्यवस्था वर्ग भेद की नीति का अनुसरण कर रही है|जिससे अमीर और अमीर तथा गरीब और गरीब होता जा रहा है और पूरा ध्यान इस और केन्द्रित है कि गरीब के बालक उनके बालकों के समकक्ष न होने पाए,इस तथ्य से ध्यान हटाने के लिए दोष दूसरों के सिर थोपे जा रहे हैं |

अगर सरकार की नीयत साफ़ है और वह वाकई देश के सभी बालकों का सर्वांगीण विकास चाहती है तो सिर्फ संसद में एक बिल पास कर दे जिसमें प्रावधान हो की चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से लेकर सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी तक,वार्ड पंच से लेकर प्रधान मंत्री तक अर्थात सभी श्रेणी के राजकीय कर्मचारी,अधिकारी तथा  राजनेताओं के बच्चों को राजकीय विद्यालयों में अध्ययन अनिवार्य होगा अन्यथा उनकी सेवा समाप्त कर दी जाएगी,उन्हें पदच्युत कर दिया जाएगा |

सिर्फ और सिर्फ इस दिशा में उठाया गया यह एक कदम पर्याप्त होगा शिक्षण व्यवस्था के परिमार्जन के लिए |परिणाम आपके सामने होगा कि आज हम जिस शिक्षा की दशा का रोना रो रहे हैं कल उसी के गीत गाते  नज़र आयेंगे |—————–जय हिन्द !

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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