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भय के दो स्वरुप होते हैं ज्ञात और अज्ञात | भारतीय संस्कृति में नारी को लेकर पुरुषों के मन में सदैव दोनों भय उपस्तिथ रहे हैं | सृष्टी के रचियता परमात्मा जो स्वयं सम्पूर्ण है के बाद इस विश्व में नारी के समान कोई अन्य प्राणी उसकी शक्ति की तुलना में नहीं ठहरता | यही कारण रहा है की पुरुषों ने अपनी प्रभुसत्ता सिद्ध करने के लिए नारी की नानाविध आलोचनाओं का सहारा लेकर उनको पुरुषों की तुलना में कमतर साबित करने का प्रयास किया है | नारी का एक महान गुण जो उसको श्रेष्ठतर बनता है वही उसकी कमजोरी का कारण भी बना है ,और वह है -सहनशीलता |                                                                                                                              भारतीय आध्यात्म यहाँ तक की कबीर जैसे महात्माओं ने भी साधक को नारी से दूर रहने की शिक्षा दी है | इसका सीधा सा अर्थ था कि पुरुष नारी की तुलना में कमजोर है वह उसकी आकर्षण शक्ति के सामने नहीं टिक सकता है | पुरुष प्रधान समाज ने इस भ्रान्ति को जन्म दिया कि नारी पतन का मार्ग है,नारी अछूत है,नारी निंदनीय है,नारी अवगुण की खान है | और हमने उनकी परोक्ष बात को बिना समझे इन भ्रांतियों को अंगीकार कर लिया और जननी को कलंक मानकर स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने की नादानी की है |                                              नारी की श्रेष्ठता का पुरुषों को भान तो सदा रहा है ,लेकिन मन में इस अज्ञात भय से की कहीं नारी को को उसकी श्रेष्ठता का बोध हो गया तो उनकी प्रभुसत्ता संकट में पड़ जाएगी ,वे सतत इस प्रयास में रहें हैं कि नारी को कमतर साबित किया जाये | और नारी की महानता देखिये की वो सब कुछ जानते हुए भी इन सबसे अनजान रहती है !यह नारी का दूसरा महानतम गुण है -क्षमा !!     ———-निरंतर

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